Friday, 24 April 2026

बाद में लिखूंगा...

 

Baad me Likhunga

This poetry is completely dedicated to one of my friends' wife who is my Bhabhi. The poetry is pure decent, and full of dignity. Go through the poetry first, then I'll tell you the intention behind...

आपकी साँझ जैसी आँखों से निकल पाया तो कुछ लिखूंगा,

यानी कि आंखों से चेहरे तक फिसल पाया तो कुछ लिखूंगा,

कुछ लिखने खातिर मुनासिब होगा कि आपको फिर से देखूं,

पर आपको देखने के बाद मैं सम्भल पाया तो कुछ लिखूंगा,


आप के आगे तो गुलदस्ता अपना चेहरा छिपाता ही होगा,

आप छू दें तो सदाबहार बाकी फूलों मे इतराता ही होगा,

आप किसी फुलवारी की तरफ कभी जा कर तो देखिए,

गुलाब अपने ही पसीने में ना पिघल पाया तो कुछ लिखूंगा,


ये गुजारिश है कि बुरा मत मानिएगा मेरी किसी बात का,

आप भाभी हैं, आपसे रिश्ता बनता है मेरा हंसी मजाक का,

आप तो जानती होंगी लोग तारीफें कब और क्यों करते हैं,

इन झूठी तारीफों से आपका मन बहल पाया तो कुछ लिखूंगा,


आपके प्रति मेरा आदर और सम्मान बना रहे वैसा ही,

सो मैंने प्रभु से नहीं मांगा एक हमसफर आप जैसा ही,

आप दोनों को मुस्कुराता देखूंगा तो कहां फुरसत होगी मुझे,

अपनी उस खुशी को शब्दों में बदल पाया तो कुछ लिखूंगा,


The poetry is written to present with a gift in the beautiful memory of first casual meeting at a railway station. This poetry is the compensation for not gifting right at the time.

By the way, some links to approach me for my other works (significant and trivial) are provided below:

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