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Monday, 7 February 2022

बुरा लगता है...

 

बुरा लगता है...

निधि नरवाल की एक कविता है, Odd One Out (बुरा लगता है)। मैंने उस कविता को अपने शब्दों में लिखने का प्रयास किया है। जब दोस्त के कदम (किन्ही मजबुरियों में ही सही) एक बार बाहर निकल जाते हैं, तो उसकी दुनिया बदल जाती है। फिर चाहे आपके या उसके लिए दुनिया का अर्थ कुछ भी हो।

इसी पर कहा है

दोस्त निकल के औरों के हैं दोस्त हो गए

उनका क्या जो गाँव में ही बेकार हैं बैठे,

(Friends became friends of many after once going out. But what about those who didn't go out ever?)

कुछ के हैं सहपाठी कुछ के सहकर्मी है,

हम ही हैं, जो अपने मन को मार हैं बैठे,

(Some have classmates and some have colleagues. Only we are here with hopelessness and disappointment.)

जीत लिया कुछ ने वो हीरा आसानी से,

खेला ना, फिर भी वो दोस्ती हार है बैठे,

(Some has effortlessly won the diamond (my friend), while we lost it without playing a game.)

घुमे जिन संग हमने बाग-बगीचे, आहर,

यादों के संग आज भी अपने द्वार हैं बैठे,

(Sitting at the doorsteps with the memories when used to walk across the orchards, gardens and water reservoirs.)

मेरा बस है वो और उसका एक मैं भी हूँ,

हम फारिग हैं, दोस्त से पर लाचार हैं बैठे,

(I have only him, while he has me like many others. We are free, but helpless by our friends.)

मिलते रहने के वादे पर जो थे दस्तखत,

कागज़ का वो टुकड़ा तो हम फाड़ हैं बैठे

(Torn off the piece of paper on which we had signed the agreement of keeping in touch.)


This poetry is already published on my YourQuote page (link below) on February 19, 2024. But reposting it here so that more readers can shower love.

By the way, some links to approach me for my works (significant and trivial) are provided below:

Monday, 13 January 2020

इश्क़ और ठंढ.....

Fog and Smog
ये कोई कविता नहीं है, बस मन में आने वाला एक खयाल है, जिसे ज्यों का त्यों लिख दिया है।

मैं चलता जा रहा हूँ। सोचता हूँ कभी कभी, किसी किसी बात को। मुझे नहीं पता ये सबकुछ क्या चल रहा है। कभी कभी खुद में ही सरकार की नीतियों और विपक्ष के मुद्दों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन ये सब कुछ सिर्फ एक कोशिश मात्र है। मुझे पता है कि इसका कुछ होने वाला नहीं है। और मुझे ये भी पता है कि अगर कोई राजनीतिक दल अच्छा नहीं भी है तब भी हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, उसे बदलने का, या फिर उसे सुधारने का।

गाड़ी से चलने पर सड़कों की खराबी समझ में आती है। लेकिन पैदल चलने का एक अपना ही अंदाज़ है। सड़क पर बने हुए गड्ढे, और उन गड्ढों से निकली हुई एक छोटी सी पत्थर, जिसे पैरों से ठोकर मारते मारते कब आप सामने से आने वाले गाड़ी के करीब पहुँच जाते है पता नहीं चलता है। मौसम अगर ठंढ का हो तो मज़ा कुछ ज़्यादा ही हो जाता है। क्योंकि तब आपके पैरों में जुतें होते है, जो पत्थर को ठोकर मारना और आसान बना देती है।

ऐसे ही मैं भी आज जा रहा था। पैदल चल रहा था, कुछ सोचते हुए। फिर मेरे मन में चल रहा कोई सामाजिक मुद्दा जाने कब गीत में बदल गया पता ही नहीं चला। हैरान तो मैं तब हुआ जब मुझे ये एहसास हुआ कि मैं एक अंग्रेजी गाना गुनगुना रहा था।

मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। मुझे ये भी नहीं पता था कि मैं पहुंचा कहाँ तक हूँ। मोबाइल निकाल कर अपना location देखने का भी मन नहीं कर रहा था। हाथ को जैकेट के जेब में छिपा कर रखा था। कोई अंग्रेजी, या शायद कोई राहत फतेह आली ख़ान का कोई गीत गुनगुना रहा था। वजह ये थी कि शायद गीत गुनगुनाने से ठंढ का एहसास कम होता है। पर अगर ठंढ से इतना ही दिक्कत है तो घर से निकलने की ही क्या ज़रूरत थी, ये मैं समझ रहा था।

वो कहते हैं न, कि जो होनी होती है, वो होकर ही रहती है। कुछ ऐसा ही था मेरे साथ भी। उस दिन चलते-चलते मेरे सामने अचानक से वो प्रकट हो गयी। मैंने ज़रा गौर से उसके चेहरे को देखा। अरे, ये तो वही चेहरा था, जिसे मैं हमेशा देखना चाहता हूँ। कई बार मैंने कोशिश की कि उस चेहरे को अपनी आँखों में बसा लूँ, ताकि उसे देखने की बेचैनी ख़तम हो जाए। लेकिन इन आँखों में तो आँसू भी नहीं आते, फिर उसके चेहरे की तस्वीर तो बहुत बड़ी बात हो जाती है।

कई बार मैं सोचता हूँ, ये इश्क़ होता ही क्यों है। लेकिन फिर मैं सोचता हूँ, मुझे क्या है, मुझे तो इश्क़ हुआ ही नहीं है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि कभी होगा भी नहीं। हो भी सकता है कि चलते- चलते किसी मोड पर कभी इश्क़ हो जाए। वो जैसे फिल्मों में होता है न- LOVE AT FIRST SIGHT, वैसा वाला। और ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि मेरी तो एक Crush भी है। Crush तो समझते हो न?

आओ, पहले Crush ही समझा दूँ। Crush वो होता है जिसे आप प्यार नहीं करते, और न ही वो आपको प्यार करता है। मतलब हो भी सकता है कि वो आपको प्यार करता हो, लेकिन आपको ये बात पता नहीं है। यहाँ तक कि आप ये पता भी नहीं करना चाहते कि वो आपसे प्यार करता है कि नहीं, और आप अपने प्यार का इजहार भी नहीं कर पा रहे हैं। ये वो है, जिसके पास आने पर आपकी धड़कने तेज़ हो जाती हैं, घबराहट, शर्माहट, हिचकिचाहट, और सारे आहट महसूस होने लगते हैं। आप उससे बात करना चाहते हैं, लेकिन उसके पास भी नहीं जा पाते। आप उसको खुश रखना भी नहीं चाहते और परेशान भी नहीं देख सकते। Crush मतलब वो, जिसके लिए आप पढ़ने जाते हो, लेकिन पढ़ नहीं पाते। जिसे सामने बैठा कर सिर्फ देखते रहना चाहते हो, लेकिन उससे नज़र भी नहीं मिला पाते। ऐसी बहुत सी चीजे हैं, जिससे आपको लगता है कि आपका किसी पर Crush है।

Crush तो मेरी भी है। ये Crush ही तो है, जो अभी अभी दिखी है। हर बार सोचता हूँ, जी भर कर देख लूँ। देख लूँ ताकि इस चेहरे को अपनी आँखों मे बसा सकूँ। आँखों में बसा सकूँ ताकि अगली बार उसे देखने की बेचैनी न रहे। लेकिन इन आँखों में तो इतनी भी जगह नहीं है कि इनमें आँसू आ सके। मैंने अपना फोन निकाला। अभी कुछ देर पहले मैंने अपना लोकेशन देखने के लिए अपना फोन नहीं निकाला था। मुझे ठंढ लग रहा था। लेकिन अभी Crush की तस्वीर लेने के लिए मैंने फोन निकाला। सोचा, चलो आँखों में न सही, फोन में ही उसकी तस्वीर कैद कर लेता हूँ।

जैसे ही मैंने camera को on किया, उधर से Pop-Up आया, No enough space in memory. हाँ, याद आया। कुछ दोस्तों की यादें हैं, memory में। मैंने फोन का storage देखा। मेरे फोन में तो 0 KB जगह बची थी। और crush की तस्वीर कम से कम 1.5 MB का होगा। मैंने सोचा दोस्तों की यादों को memory से बाहर कर देता हूँ। लेकिन फिर सोचा- एक लड़की के लिए? और वो भी ऐसी लड़की, जिसका नाम भी नहीं पता मुझे, जबकि लगातार 6 साल से उस एक चेहरे की जगह कोई दूसरा चेहरा नहीं ले पाया है। इतने में तो लोगों के बीच S** और Break-Up भी हो जाता है।

मैं सोचता हूँ अगर कभी वो मेरे बारे में सोचती होगी तो क्या? यही न कि मैं फटटू, डरपोक, बुजदिल हूँ। क्योंकि उसे थोड़े पता है कि मुझे कभी बोलना ही नहीं है। लेकिन फिर सोचता हूँ, क्या वो मेरे बारे में सोचती भी होगी?
थोड़ा अजीब है, लेकिन सच है।

दोस्त तो ज़िंदगी की एक अटूट कड़ी होते हैं। उनकी ही यादें मिटा दूँ मैं? लेकिन यादें तो मैं फिर से भी बना सकता हूँ। लेकिन फिर से यादें बनाने के लिए इसका चेहरा memory से हटाना पड़ेगा। अजीब असमंजस है। एक तरफ दोस्त हैं, दूसरी तरफ Crush है। लेकिन किसी ने कहा है- जो मिलता है उसे रख लेना चाहिए। चलो, दोस्तों के साथ जो भी यादें है, या तो उन्हे मिटा दो या फिर छोटा कर दो। लेकिन Crush की तस्वीर तो चाहिए। क्योंकि बार बार उसे कहाँ-कहाँ ढूँढता रहूँगा मैं। फोन में अगर उसकी तस्वीर आ जाए तो क्या बात है। दोस्तों से कह भी तो पाऊँगा- ये तुमलोगों की भाभी है।

क्या ये बदनाम करना नहीं होगा? अच्छा दोस्तों से नहीं कहूँगा। मेरे इश्क़ को गुमनाम ही रहने दूंगा मैं। Feeling क्या होता है? तुम उसका पता बता दो तो मैं उसकी शादी के दिन उसकी बारात में जाकर खाना भी खा सकता हूँ। ये कोई बड़ी बात नहीं है। यहाँ तक कि बिना कुछ महसूस किए उसका जयमाला का स्टेज भी सजा सकता हूँ।

लेकिन मुझे तब भी उसकी एक तस्वीर लेनी है। चलो, उसकी तस्वीर लेने के लिए दोस्तों की यादों को नहीं मिटाऊंगा, भले खुद को ही खोना पड़े। लेकिन वो गयी कहाँ !!!!!!!!!!!!!!!?????

इतनी देर से जो मैं सोच रहा था, क्या वो सब एक ख़याल था? क्या वो एक सपना था? नहीं, चल तो रहा था मैं। सड़क पर पड़े एक पत्थर को ठोकर भी मार रहा था। क्या ये सब झूठ है? क्या वो मुझे दिखी भी थी?
मैंने खुद को एक झापड़ लगाया। चोट लगता है, इसका मतलब ये सब हक़ीक़त है, कोई सपना, कोई ख़याल नहीं है। मैं रुक कर सोच रहा था, उस चेहरे को फिर से देखना पड़ेगा। इस बार भी मैंने उसे बढ़िया से नहीं देखा।

मैं एक तरफ थोड़ा तेज़ी से भागा। इस उम्मीद में कि शायद वो फिर से दिख जाए। कुछ कहना नहीं है, बस एक आखिरी बार देखना है। या फिर उसकी तस्वीर लेनी है, ताकि दुबारा जब भी उसे देखने का मन करे तो देख सकूँ। माँ जब पूछे कि कैसी लड़की चाहिए तो दिखा सकूँ। जब कभी कोई Drawing बनाने का मन करे, तो उसकी तस्वीर बना सकूँ। लेकीन वो नहीं दिखी। अबकी बार मैं दूसरी तरफ भागा, फिर से उसी उम्मीद में। लेकिन वो फिर भी नहीं दिखी। मैं खड़ा हो गया, अब मुझे ये नहीं पता चल रहा था कि मुझे किधर जाना है और मैं आया किधर से था। मुझे उस दिन अपना location देख लेना चाहिए था !!!!!!!!!!

"सिर्फ बनारस की गलियों में ही नहीं जनाब, इश्क़ अक्सर कुहासा में भी खो जाता है।"

Monday, 19 August 2019

दोस्ती for me...

confession
Ek Confession Raat Ke Naam.

चलो आज एक confession करता हूँ। वैसे तो मैं ज़्यादातर अपने confession अँग्रेजी में ही करना पसंद करता हूँ, ताकि किसी को समझ में ना आए। लेकिन ये वाला हिन्दी मे होगा। ताकि सबको समझ मे आए, और पूरा पूरा समझ मे आए। क्यूंकी ये दोस्त के बारे मे है, और पढ़ने वाले भी मेरे दोस्त ही है, और मैं इतना अच्छा नहीं लिखता अँग्रेजी की सभी लोग समझ जाए।
मेरे बहुत सारे दोस्त है। बहुत सारे मतलब बहुत सारे। बिलकुल। इसीलिए सभी लोग ताज्जुब भी रहते है। मेरे जैसे और भी बहुत लोग है, जिनको बहुत सारे दोस्त होते है। लेकिन सबलोग सबके साथ बराबर समय नहीं दे पाते। मैं खुद नहीं जानता मैं ये कैसे कर लेता हूँ। लेकिन जो भी है वो है।

घर में सबलोग परेशान रहते है मेरे इस बात से कि मैं अपने भविष्य के साथ मज़ाक कर रहा हूँ। अच्छे अच्छे लोग भी यही सलाह दे जाते है कि दोस्ती career बनाने के पहले थोड़ा सीमित ही रखना चाहिए। जब लाइफ मे कुछ कर लो तो फिर अपनी कमाई पर करते रहना दोस्ती, बनाते रहना दोस्त।

लेकिन मैं नहीं मान सका। खुद को नहीं रोक पाता हूँ फोन करने से, WhastApp या Facebook पर मैसेज भेजने से, पोस्ट करने से। यहाँ तक कि Facebook पर मेरा एक एल्बम भी है, दोस्तों के नाम से। और ग्रुप तो कई सारे बनाए और खतम किए। यही नहीं, कई ऐसे सेक्रेट्स भी हैं मेरे जिसे मैंने बचा कर रखा है। कई बार जब दोस्तों की किसी बात का बुरा लगा है तो मैंने खुद को संभाला जरुर है, लेकिन उस वजह को भी संभाल कर रखा है, और कभी कभी जब उनको देखता हूँ तो बड़ा ही तकलीफ होता है। लेकिन इन तकलीफ़ों को मैंने ही पाल रखा है।

अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपने सभी दोस्तों से एक प्रॉमिस किया था, कि उस दिन के बाद से कोई भी सेक्रेट्स नहीं रखूँगा। बोलने से पहले सोचुंगा नहीं कि बोलने के बाद सामने वाले को बुरा लगेगा या अच्छा लगेगा। बोलने से पहले ये नही सोचुंगा कि ये मुझे बोलना चाहिए या नहीं। बात करते टाइम कभी भी दोस्तों के किसी बात का बुरा भी लगा तो उसे उसी टाइम बता दूंगा, रिकॉर्डिंग करके नहीं रखूँगा, और ना ही स्क्रीनशॉट रखूँगा। क्यूंकी कभी कभी जब बाद मे उन सब रिकॉर्डिंग को सुनता हूँ, या स्क्रीनशॉट को देखता हूँ, तो बहुत ही तकलीफ होती है। कई बार तो मुझे ये लगने लगा है कि दुनिया मे सब फरेबी है। जबकि बाद मे गहराई से सोचने पर मेरी भी गलती निकाल ही जाती है।

यही वजह है। शुरू शुरू में मैं बहुत ही ज़्यादा या फिर कहें कि एक Introvert हुआ करता था। और पढ़ाई का कीड़ा भी। इसके अलावा मुझे कविता कहानी का शौक था, और भगवान का दिया हुआ एक talent था, painting और drawing का। सब इसीलिए मुझे बहुत पसंद करते थे। पढ़ाई में थोड़ा अच्छा होने के कारण स्कूल से लेकर हाइ स्कूल तक मेरा एक अलग ही पहचान था। लेकिन स्कूल में ही कुछ दोस्त मिल गए। उन सबमे मेरा एक ही सबसे करीबी दोस्त था। उसके साथ जितना बन पड़ा मैंने मस्ती से लेकर खेल कूद और पढ़ाई सब की। लेकिन हमारी दोस्ती को लगी नज़र, वो भी लड़कियों की नज़र। और आंठ्वी क्लास तक आते आते हमारी दोस्ती का break-up हो गया। वो पढ़ने के लिए हाइ स्कूल चला गया, क्यूंकी वो सीनियर था, और मैं रह गया अपने मिडिल स्कूल मे ही।

दोस्ती यूं ही नहीं टूटी थी। ये एक शजिस थी। कईयों ने आकर रोज मुझसे मेरे उस दोस्त के बारे मे एक गलत धारणा देना शुरू कर दिया। रोज मुझे उसकी शिकायत सुनाते, रोज उससे दूर रहने को बोलते, रोज उसको लेकर कोई नयी कहानी बनाकर लाते। और इस तरह जब उसने मिडिल स्कूल से अपना TC लिया, उस दिन से हमारी और उसकी दोस्ती बंद।

मैं देखता था उसकी आँखों मे एक उम्मीद, कि शायद मैं बोल पड़ूँ उससे। लेकिन ये हो नहीं पाया। मेरे भीतर जो उसके प्रति एक घृणा कि भावना भरी हुई थी, उसने मुझे उससे बोलने ही नहीं दिया। उसने मुझे बराबर शक्ति दिया, कि उसकी मासूमियत को नज़रअंदाज़ करके मैं रोज उसके रास्ते से आगे बढ़ जाता था, और वो मेरा चेहरा देखता रह जाता था। और मेरा स्कूल मे एक रोब था। मेरा attitude मेरे औकात से ज़्यादा था। ये बात मेरे दोस्त को भी पता था। इसलिए उसने भी कभी पहल नहीं किया। उसने कभी हिम्मत ही नहीं किया मुझसे बात करने की।

इसके बाद मेरे कुछ और दोस्त हुए। उसी एक साल मे। मिडिल स्कूल मे ही जब मैं अकेला पड़ गया तो मैंने कुछ दोस्त बना लिए। लेकिन हर महीने मेरी दोस्ती टूटती थी, और फिर एक दोस्त बनता था। फिर दरार आती, फिर दोस्ती होती, फिर दरार आती। एक दोस्त के जाते ही दूसरा दोस्त, फिर दूसरे के बाद तीसरा। और मेरे उस जिगरी दोस्त के हाइ स्कूल जाने के बाद सिर्फ एक साल में मैंने करीब 26 दोस्त बनाए। और 26 में से पूरे 26 से break-up भी हुआ और फिर 6-7 से वापस दोस्ती हो गयी। लेकिन फिर मैं भी हाइ स्कूल में चला गया। और दोस्ती थोड़ी कम हो गयी।

कुछ का ये भी मानना है कि मिडिल स्कूल में मेरा किसी लड़की पर crush था। और उससे अपनी setting करवाने के लिए मैं लड़को को अपना दोस्त नहीं, बल्कि post-man बना रहा था। इसीलिए मेरी दोस्ती टूटती भी थी, और दोस्ती होती भी थी। लेकिन मेरे भाई, पहली बात तो ये, कि मुझे उस समय पता भी नहीं था कि crush क्या होता है। और मैं अपनी पढ़ाई और अपने passion को लेकर इतना सिरियस था, कि दूसरा कुछ मुझे दिख ही नहीं रहा था। और गाँव की लड़कियों के बारे में ऐसा कौन सोचता है भला???
दूसरी बात ये, कि जैसा कि मेंने बताया, कि मेरा attitude मेरे औकात से ज़्यादा था। इसलिए लड़कियां भी ना तो मुझसे बोलना चाहती थी, और ना ही crush जैसा कुछ था।

मिडिल स्कूल से निकलने के बाद लड़के पढ़ाई को लेकर थोड़ा सिरियस हो जाते है। और फिर मैं तो अपने पहली क्लास से ही सिरियस था पढ़ाई के मामले में। तो मेंने दोस्ती को साइड किया, और फिर से पढ़ाई शुरू। फिर से एक introvert वाली life। एक boring लाइफ। कारण ये भी था कि नए लोग मिल रहे थे। उनसे बात शुरू करने में थोड़ा अजीब महसूस हो रहा था। और इस तरह अपने 2 साल के हाइ स्कूल को पूरा करते करते मैं वापस से एक introvert हो चुका था।

फिर intermediate में मेरे कुछ दोस्त बने। वो दोस्त भी उन्हीं के वजह से बने। मैंने उनसे दोस्ती नहीं की बल्कि उन्होने मुझसे दोस्ती की थी। ये दोस्ती अभी तक चल रही है। लेकिन आजकल (आप पोस्ट की date ज़रूर देख लें) लग रहा है कि हमारी दोस्ती में थोड़ी सी डगमगाहट आ गयी है। लग रहा है कि जैसे सबलोग अलग हो रहे हैं। लग रहा है कि जैसे मैं सबसे दूर हो रहा हूँ, और लगा रहा है जैसे मेरी वजह से हमारा ग्रुप ही खतम हो जाएगा।

मैं थोड़े दिन के लिए दिल्ली गया था, तो मैंने सबको बोल दिया था कि बात नहीं हो पाएगा, टाइम नहीं मिल पाएगा। वजह अगर कहीं घूमने गए हो तो घूमोगे, फोटो-सेलफ़ी वगैरह लोगे। फोन पर बात थोड़ी कारोगे। और चूंकि वहाँ पर हमारे काफी सारे रिश्तेदार भी हैं, तो उनके पास जाओगे तो थोड़ा गाँव घर कि बात करोगे, थोड़ा हंसी मनोरंजन होगा। फोन पर लगे रहोगे तो लोग क्या कहेंगे। तो मैंने सबको बोल दिया कि दिल्ली से वापस आ जाऊंगा तो शायद बात हो पाएगी, और वहाँ भी अगर टाइम मिल गया तो बात कर ल्ंगा।
जब मैं गाँव आया तो क्लास का जितना भी छुट गया था, वो सब recover करने के चक्कर में टाइम नहीं दे पाया। और फिर मेरा फोन गुम हो गया, तो इस वजह से भी थोड़ा mentally disturbed हूँ। मैं अभी तक खुद को उस हादसे से वापस नहीं ला पा रहा हूँ। तो ऐसे में मैं नहीं समझता कि अगर मैं दोस्तो को समय नहीं दे पा रहा हूँ तो मेरी कहीं गलती है।

लेकिन, मेरे कुछ दोस्तो ने इस बात कि गांठ कर ली है, कि भाई, दिल्ली जा रहे हो तो बिज़ि रहोगे, और गाँव आ गए तब भी बिज़ि ही हो। अब तुम बिज़ि इंसान हो गए हो। हमें ना तो मैसेज करते हो, न फोन करते हो, ना ही हमारे मैसेज का पहले जैसे तुरंत रिप्लाइ करते हो।

हाँ भाई, मैं नहीं करता रिप्लाइ, और नहीं करता फोन। और अगर तुम्हें लगता है तो ठीक है, नहीं करनी मुझे किसी से बात। वैसे भी मैं एक Introvert था, और बीच में भी कुछ दिन Introvert की लाइफ मेंने जी है, और आगे भी जी सकता हूँ। मेरी दोस्ती अब नहीं चलती। क्यूंकी मैं किसी को दोस्त बनाना ही नहीं चाहता। और अगर दोस्त बनते भी है तो डर लगा रहता है break-up होने का। इसीलिए कभी कभी sacrifice भी कर लेता हूँ, उनके किसी किसी बात का बुरा भी नहीं मानता, और अगर मानता भी हूँ तो उसे जाहीर नहीं करता और खुद में ही रख लेता हूँ।

मेरा कभी भी कोई एक दोस्त नहीं हुआ है। क्यूंकी जब भी मैंने सिर्फ एक दोस्त से ज़्यादा दोस्ती निभाई है, तब तब हमारी दोस्ती का break-up हुआ है। मैं इसी लिए एक से ज़्यादा दोस्तों से दोस्ती करता हूँ, और सबके साथ बराबर टाइम देता हूँ। ताकि दोस्ती बनी रहे, और किसी की नज़र ना लगे।

और नज़र लगने का कुछ नहीं है। मैं खुद ही बहाने ढूँढता हूँ, शक करता हूँ दोस्तों पर, उनके साथ कभी कभी बेकार सा मज़ाक कर देता हूँ जो मुझे नहीं करना चाहिए, और कई बार तो गुस्सा भी हो जाता हूँ उनकी बातों पर, उनके plan पर मैं कभी agree नहीं करता और खुद को हमेशा सही साबित करने की कोशिश करता रहता हूँ। इसीलिए मेरी दोस्ती अब नहीं चलती।

Bro, मुझे पता है कि मैं हर बार सही नहीं हो सकता हूँ। ये तो तुमलोग हो जिसने मुझे अभी तक अहसाह नहीं होने दिया और ज़रा सा भी महसूस नहीं होने दिया मेरे पहले वाले दोस्त की कमी का। लेकिन बीते कुछ दिनों से फिर से यही लग रहा है कि एक बार फिर से मेरा कोई भी दोस्त नहीं होगा, और फिर से मेरी दोस्ती टुकड़ों में होगी, थोड़े थोड़े दिनों के लिए। और अगर ऐसी नौबत आई ना, तो बता रहा हूँ मैं, कि मेरी किसी से दोस्ती नहीं होगी।

बाकी बस, इतना ही था। मुझे भी नहीं पता ये लिखने के पीछे क्या कारण है। मैंने ये क्यूँ लिखा, मुझे खुद नहीं पता है। तुमलोगों को जो वजह मिले, समझ लेना, मुझसे पूछना मत।

Monday, 31 December 2018

And We Never Met.......

Just a poem. Nothing else than just words.
Just an art of mine.
I want assure that this poem is never about me. So, after reading this out, please don't mean something.

She was neither one of my friends, nor village mate,

She did not belong to my relatives. We met in class debate,

And once she told me that she would meet me again,

But a long time has passed, and she never met.


I shaw her for the first time walking fast on a street,

That was the first time, I felt my regular  heart-beat,

She crossed me slightly, and I remained looking at her,

Later I found that she was nobody but my classmate

But a long time has passed and she never met.


I attended every single class of mine, did not bunk,

I was completely in sense, not I was drunk,

when I decided to compete myself against her,

After all she was my competitor, being a classmate,

But a long time has passed and she never met.


The way she used to smile, the way she used to laugh,

Her angry look also was awesome, I can't explain even half,

I could not see moody expression on her beautiful face,

So, in making jokes for her smile, I never got a little late,

But a long time has passed and she never met.


She was right often on some topic, while class lecture,

She was good in drawing chemistry atomic structure,

To prove her wrong, I had an arguement with teacher very often,

I have been punished many times to be out of gate,

But a long time has passed and she never met.


We became friends, who teased each other for no reason,

We were Love birds in different angles and many vision,

We did not share our notes and discussions in class,

Her beautiful handwriting is not recognised to me as yet,

But a long time has passed and she never met.


I did never because of my attitude, but she said- You're right.

That was what my friends used to address as Love Fight,

She was sharp mind, but did not result better than me,

My belief was in doings and that of her was in Fate,

But a long time has passed and she never met.


Even after her no attitude, I named her miss attitude,

Her treat for everyone was soft, I treated them rude,

She was going good for her wills, dreams and goals,

She adviced me doing the same and move on to life set,

But a long  time has passed and she never met.


I want meet her last time, to say I was not waiting for her,

That all, she told me are enough for me to take care,

I want to say, I just miss those days when she was in my life,

I know to take any decision, it has been so late,

But a long time has passed and she never met.


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